बंगाल चुनाव: ‘दीदी’ बनकर दिलों पर छाईं ममता, यूं बढ़ाती गईं तृणमूल की ताकत


सार

ममता बनर्जी इस बार अपनी पारंपरिक भवानीपुर विधानसभा सीट के स्थान पर नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगी। वहीं, भाजपा ने इस सीट पर कभी तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा रहे सुवेंदु अधिकारी को उम्मीदवार घोषित किया है। उल्लेखनीय है कि सुवेंदु अधिकारी ने पिछले विधानसभा चुनाव में यहां से जबरदस्त जीत हासिल की थी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
– फोटो : अमर उजाला

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पश्चिम बंगाल में अभी तक सत्ता किसके हाथ जाएगी ये तो समय बताएगा। परंतु यहां भाजपा ने इस बार के विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। भाजपा ने कभी ममता के लिए प्रचार करने वाले सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम में अपना उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में ममता की राह आसान नहीं दिख रही है। बहरहाल, आइए जानते हैं कैसा रहा है ममता बनर्जी का अब तक सफर..

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने इसी साल जनवरी में अपना 66वां जन्मदिन मनाया है। उनका जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक बेहद सामान्य परिवार में हुआ था। ममता बनर्जी साल 2011 से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं और प्रदेश की नौवीं सीएम हैं। इससे पहले वह देश की संसद में बंगाल की सबसे युवा सांसद और भारत सरकार की केंद्रीय मंत्री भी रही हैं।

वह राज्य के मुख्यमंत्री पद पर कार्य करने वाली पहली महिला हैं। 19 मई 2016 को वह लगातार दो बार जीतने वाली एकमात्र महिला मुख्यमंत्री बनी थीं। आठवें मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के अंत में जबरदस्त जीत के तुरंत बाद उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे थे। वर्ष 1997 में बनर्जी ने खुद को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग कर लिया था। इसके बाद उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, जिसे टीएमसी या एआईटीएमसी भी कहा जाता है। 

कांग्रेस से राजनीतिक सफर शुरू किया
ममता बनर्जी ने अपने राजनैतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस पार्टी के सदस्य के रूप में की थी। 1976 में वह राज्य महिला कांग्रेस की महासचिव चुनी गईं। 1984 में कोलकाता के जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने अनुभवी साम्यवादी नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा और ये चुनाव जीत कर सबसे युवा भारतीय सांसद बन गईं। उन्होंने अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव पद पर भी काम किया। 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार में वे मानव संसाधन, युवा कल्याण–खेलकूद और महिला-बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री भी रहीं।

उनके द्वारा प्रस्तावित खेल–कूद विकास योजना को सरकार से समर्थन न मिलने पर उन्होंने विरोध के तौर पर अपना इस्तीफा दे दिया था। 1996 में कांग्रेस से मतभेद के चलते उन्होंने पार्टी छोड़कर अपना अलग दल बनाने का फैसला किया और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। उनकी पार्टी ने काफी कम समय में बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ कड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

1999 में ममता बनर्जी एनडीए गठबंधन सरकार में शामिल हो गईं और उन्हें रेल मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया। वित्तीय वर्ष 2000-2001 के दौरान उन्होंने 19 नई ट्रेनों की घोषणा की। 2001 में उन्होंने एनडीए सरकार से भी गठबंधन तोड़ लिया लेकिन 2004 में वे फिर से एनडीए से जुड़ीं और कोयला और खदान मंत्री का पद संभाला। 2006 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। ये उनकी पार्टी की सबसे बड़ी असफलता थी। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने यूपीए सरकार से गठबंधन किया और ममता बनर्जी फिर एक बार रेल मंत्री बनाई गईं। साल 2011 का विधानसभा चुनाव उनके सियासी सफर में एक नया मोड़ ले कर आया। चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत के साथ ही 20 मई 2011 को ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं।
 

विस्तार

पश्चिम बंगाल में अभी तक सत्ता किसके हाथ जाएगी ये तो समय बताएगा। परंतु यहां भाजपा ने इस बार के विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। भाजपा ने कभी ममता के लिए प्रचार करने वाले सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम में अपना उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में ममता की राह आसान नहीं दिख रही है। बहरहाल, आइए जानते हैं कैसा रहा है ममता बनर्जी का अब तक सफर..

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने इसी साल जनवरी में अपना 66वां जन्मदिन मनाया है। उनका जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक बेहद सामान्य परिवार में हुआ था। ममता बनर्जी साल 2011 से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं और प्रदेश की नौवीं सीएम हैं। इससे पहले वह देश की संसद में बंगाल की सबसे युवा सांसद और भारत सरकार की केंद्रीय मंत्री भी रही हैं।

वह राज्य के मुख्यमंत्री पद पर कार्य करने वाली पहली महिला हैं। 19 मई 2016 को वह लगातार दो बार जीतने वाली एकमात्र महिला मुख्यमंत्री बनी थीं। आठवें मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के अंत में जबरदस्त जीत के तुरंत बाद उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे थे। वर्ष 1997 में बनर्जी ने खुद को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग कर लिया था। इसके बाद उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, जिसे टीएमसी या एआईटीएमसी भी कहा जाता है। 

कांग्रेस से राजनीतिक सफर शुरू किया

ममता बनर्जी ने अपने राजनैतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस पार्टी के सदस्य के रूप में की थी। 1976 में वह राज्य महिला कांग्रेस की महासचिव चुनी गईं। 1984 में कोलकाता के जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने अनुभवी साम्यवादी नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा और ये चुनाव जीत कर सबसे युवा भारतीय सांसद बन गईं। उन्होंने अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव पद पर भी काम किया। 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार में वे मानव संसाधन, युवा कल्याण–खेलकूद और महिला-बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री भी रहीं।

उनके द्वारा प्रस्तावित खेल–कूद विकास योजना को सरकार से समर्थन न मिलने पर उन्होंने विरोध के तौर पर अपना इस्तीफा दे दिया था। 1996 में कांग्रेस से मतभेद के चलते उन्होंने पार्टी छोड़कर अपना अलग दल बनाने का फैसला किया और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। उनकी पार्टी ने काफी कम समय में बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ कड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

1999 में ममता बनर्जी एनडीए गठबंधन सरकार में शामिल हो गईं और उन्हें रेल मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया। वित्तीय वर्ष 2000-2001 के दौरान उन्होंने 19 नई ट्रेनों की घोषणा की। 2001 में उन्होंने एनडीए सरकार से भी गठबंधन तोड़ लिया लेकिन 2004 में वे फिर से एनडीए से जुड़ीं और कोयला और खदान मंत्री का पद संभाला। 2006 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। ये उनकी पार्टी की सबसे बड़ी असफलता थी। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने यूपीए सरकार से गठबंधन किया और ममता बनर्जी फिर एक बार रेल मंत्री बनाई गईं। साल 2011 का विधानसभा चुनाव उनके सियासी सफर में एक नया मोड़ ले कर आया। चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत के साथ ही 20 मई 2011 को ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं।

 



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